रविवार, 28 फ़रवरी 2021

न तेरी न मेरी || पहाड़ी कविता

न तेरी न मेरी || पहाड़ी कविता 

Photo by Flickr from Pexels


दारू पित्ती ,नशा करी ता , 
गुस्से च आई करी सिर फोड़ीता | 
फुट भर बढ़ाई कने डंगा चिणीता ,
 दूजे दे खेतराँ दा घा बड्डी ता | 

दो दिन दी जिन्दडी बंदेया,ना तेरी ना मेरी | 
खेतर डंगे इत्थू ही रही जाणें, कजो करे हेरा फेरी ||

 दूजे दे बच्चेयाँ जो बरबाद करी ता , 
खरा ता क्या सखाणाँ था ,बुरा सखाईता |
 जम्मे थे खरे घरें,करना था खरा -खरा, 
पूजा पाठ छड्डी ,सुट्टा सिखीता | 

दो दिन दी जिन्दड़ी बन्देया,ना तेरी ना मेेरी |
 खरे कम ही रही जाणे,बाकी रूत घनेरी || 

छः फुट्टा शरीर तेरा,डेढ़ फुट्टी चौड़ाई , 
जेड़ी जमीन छातिया ने लाई , ओ भी कम्मे नी आई | आखीं दस्सियाँ ,किती गलत कमाई , 
अज उसदी कल तेरी बारी भी आई |

 दो दिन दी जिन्दड़ी बन्देया,ना तेरी ना मेेरी |
 हुण भी सुधरी लै,होई जाणी देरी ||

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